Adi Shankaracharya जानिए आध्यात्मिक भारत रचयिता जगतगुरु आदि शंकराचार्य बारे मे

Adi Shankaracharya

Adi Shankaracharya
जगतगुरु आदि शंकराचार्य का जीवन

Adi Shankaracharya आध्यात्मिक भारत रचयिता जगतगुरु आदि शंकराचार्य का जन्म सन् १७८८ ई. में केरल में काषल अथवा कालपी नामक गाँव में हुआ था।
आज से १२ हजार साल पहले जब भारत राजनीतिक तौर पर ही नहीं बल्कि धार्मिक तौर पर भी बटा पड़ा था, तब धर्म के नाम पर आडंबर था |
जिसे आज हम हिंदू धर्म कहते हैं वह ८४ से भी ज्यादा अलग-अलग संप्रदायों में बटा था,
यहां तक की बुद्ध धर्म में भी तंत्र-मंत्र करने वालों का बोल बाला था।
जगतगुरु आदि शंकराचार्य के पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था ।
कहते हैं भगवान शिव के आशीर्वाद से ही उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम उन्होंने शंकर रखा।
जन्म से ही शंकर अपनी अद्भुत प्रतिभा से सबको चकित कर रहे थे।

वह इतने प्रतिभाशाली थे की 3 साल की आयु में ही उन्होंने मातृभाषा मलयालम सीख ली, वेदों को पड़ा ,
धर्म के कठिन प्रश्नों का उत्तर देने लगे।
जब बालक शंकर केवल 3 वर्ष के थे तभी उनके पिता शिव गुरु का देहांत हो गया।
पिता की मृत्यु के बाद शंकर को माता ने आचार्य के पास भेजा और वहां एक चमत्कार हुआ जिन शास्त्रों के अध्ययन के लिए शिष्य को 20 वर्ष लग जाते हैं उसे बालक शंकर ने केवल 2 वर्षों में समाप्त कर दिया और वापस अपनी माता के पास कलादि लौट आए।
एक दिन अगस्त्य ऋषि बालक शंकर के घर पहुंचे,
शंकर की माता ने ऋषि से अपने पुत्र की लंबी आयु का आशीर्वाद मांगा किंतु ऋषि अगस्त्य ने उन्हें बताया कि उनके पुत्र शंकर केवल 32 वर्ष की आयु तक कीही जीवन रेखा है!

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वहीं दूसरी ओर बालक शंकर अपनी मां से कहते हैं कि इस संसार में कोई सुख नहीं वह सन्यास लेना चाहते हैं।
किंतु उनकी मां उन्हें सन्यासी बनने की अनुमति नहीं दी।
तब शंकर ने एक लीला रची और अपनी मां से सन्यासी बनने की स्वीकृति ले ली।
जिस आयु में बच्चे मां की ममता के आंचल में पलते हैं उस आयु में बालक शंकर ने सन्यास धारण कर लिया था।
सन्यासी बनने के बाद शंकर कहीं दिनों तक घूमते रहे वह गुरु की खोज में घर से निकले थे।

वे अपने जन्म स्थान कनेरी से यात्रा करते-करते ओमकारेश्वर पहुंचे।
ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के तट पर गुरु श्री गोविंदपात का आश्रम था।
शंकर 9 वर्ष के थे जब वह श्री गोविंद पाठ से मिले।
श्री गोविंद पाक ने उन्हें सन्यास की दीक्षा दी और अपना शिष्य बनाया।
श्री गोविंद पाठ के कहने पर शंकर ने श्री विष्णु सहस्त्रनाम पर श्लोकों की रचना की जिससे लोग परमात्मा के 1000 रूपों को समझ सके।
तरह तरह की परीक्षाओं के बाद श्री गोविंद पात्र ने ही शंकर को शंकराचार्य का नाम दिया।

शंकर अब शंकराचार्य के नाम से चर्चित हुए।

उनकी चर्चा की वजह थी शास्त्रार्थ। शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वानों को निरुत्तर किया है।
और उस समय शंकराचार्य की उम्र केवल 12 वर्ष थी।
शंकराचार्य कई दिनों की यात्रा के बाद काशी पहुंचे।
काशी में कई तरह से शंकराचार्य की परीक्षाएं ली गई थी।
काशी में आचार्य शंकर ने व्यास रचित ब्रह्म सूत्र, श्रीमद् भागवत गीता और उपनिषद को समझने के लिए भव्य किताब लिखने का निर्णय किया ताकि उनके गहरे अर्थो को सरल बनाया जाए।

कुछ दिनों बाद आचार्य शंकर अपने शिष्यों के साथ यात्रा करके अलकनंदा के किनारे बद्रीनाथ पहुंचे।
बद्रीनाथ में आचार्य शंकर ने अलकनंदा नदी से भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति निकालकर उसे मंदिर में स्थापित किया था उसके बाद वह बद्रीनाथ की व्यास गुफा में ही रहने लगे।
इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करके बौद्ध धर्म को मिथ्या प्रमाणित किया तथा वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया।
३२ वर्ष की अल्प आयु में सन् ८२० ई. में केदारनाथ के समीप स्वर्गवासी हुए थे।

जगतगुरु आदि शंकराचार्य के कार्य

शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं।
दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था।
उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे।
भारतीय प्राच्य परम्परा में आद्यशंकराचार्य को शिव का अवतार स्वीकार किया जाता है।
कुछ उनके जीवन के चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं,

जिससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य शिव के अवतार थे।
आठ वर्ष की अवस्था में श्रीगोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना,
पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना,
भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना – इत्यादि कार्य इनके महत्व को और बढ़ा देता है।

चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है।

कुछ लोग शृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है।
उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए।